hum dekhenge
Sunday, August 9, 2009
क्योंकि
लिखता हूँ
शायद इसलिए
की अगर लिखूं नहीं तो लगातार किसी और को पढ़ते रहना होगा
किसी और के हर्फ़ को जेहन में जगह देनी होगी
और अपनी नजमा अपने सीने में ही उलझी रहेगी
मिसरे तालू टटोलते रहेंगे
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
Followers
Blog Archive
▼
2009
(4)
▼
August
(4)
>> कहानी संग्रह >> वंशबेलखरीदेंविजयपृष्ठ: 176अपने ...
नम्बरदार हुए नाखुदा अभी छाप रहा है वंशबेल और नीड़क...
शुरुआत - हथेलियों का मरुस्थल ( १९८१) ( संग्रह ) कह...
क्योंकि
About Me
vijay
View my complete profile
No comments:
Post a Comment